और इस खेल में भी जॉर्ज खूब खेले. खूब स्को र किया. चरण सिंह को आगे करके लोक दल की राजनीति की तो भाजपा से हाथ मिलाकर उसका अछूतपना दूर किया. भाजपा को दो सीटों से बढाकर सत्ता तक लाने में जॉर्ज का उनके ब नाए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का कितना बडा हाथ है यह इतिहासकार तो तय करेंगे ही अभी की राजनीति के भी काफ़ी लोग बता देंगे. अगर जॉर्ज न होते तो एनडीए न होता, अटल बिहारी की सरकार न बनती-भाजपा को कोई राम मंदिर, धारा 370 और कॉमन सिविल कोड से दूर न क रता. हो सकता है भाजपा नेतृत्व भी यह चाहता हो और जार्ज ने बहाना उपलब्ध करा दिया हो. लेकिन यह हुआ है. इस दौर में जार्ज सा हब ने अपनी पुरानी पत्रिका 'प्रतिपक्ष ' को लगातार निकाला, बर्मा के आंदोलनकारियों, तिब्बत के आंदोलनकारियों, श्रीलंका में मानवाधिकार हनन के सवाल को, पूर्वोत्तर के बाग़ी गुटों को उनका समर्थन जारी रहा. बंगले का एक कमरा भर उ नका अपना होता था, बाक़ी सब ऐसे ही जमातों और साथियों का रहता था. पर बदले जॉर्ज का असर साफ़ दिखने में वक्त न हीं लगा. हालत यह हो गई कि गुजरात नरसंहार के बाद जॉर्ज ने दंगाइयों के पक्ष म...