कौशल्या कहती हैं कि ये एक ऐसा दर्द है जो कभी नहीं भर सकता. वो कहती
हैं, "हम चाहे जितना भी समझाने की कोशिश कर लें लेकिन उनके लिए ये बहुत
मुश्किल समय है. लेकिन मैं ये भरोसे के साथ कह सकती हूं कि वो बहुत जल्दी
इन सारे दुखों से बाहर आ जाएंगी."
"मुझे प्रणय के लिए अमृता के प्यार पर पूरा भरोसा है और यही उसे ताक़त भी देगा."
वो कहती हैं, "अमृता जाति के ख़िलाफ़ लड़ेंगी और अपने प्यार यानी प्रणय के लिए इंसाफ़ लेंगी. उनकी इस कोशिश में हम सभी अमृता के साथ खड़े हैं."
"मैं अमृता से सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगी कि वो पेरियार और आंबेडकर के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ें. इससे उसे हिम्मत और ताक़त मिलेगी."
अपने एक इंटरव्यू में अमृता ने कहा है कि उनके माता-पिता ने प्रणय को जान से इसलिए भी मार डाला क्योंकि वो प्रेग्नेंट थीं.
"अमृता की इस बात से पूरी तरह साफ़ हो जाता है कि उनके घरवालों में जाति को लेकर किस क़दर नफ़रत भरी हुई है. उनके घरवालों को लगता है कि अगर बच्चा पैदा हो जाएगा तो उनकी जाति का सम्मान कम हो जाएगा. यही कारण है कि उन्होंने इतनी बेरहमी से प्रणय को मार डाला."
अमृता ने कहा कि वे (घरवाले) हमें दर्द देना चाहते हैं क्योंकि हमनें उनकी बात नहीं सुनी.
हमारे सामाजिक ढांचें में उनकी जाति एक-दूसरे से आंतरिक तौर पर जुड़ी हुई है.
कौशल्या कहती हैं, "सवाल ये है कि क्या जब मैं या अमृता सड़क पर उतर जाएंगे, प्रदर्शन करेंगे तो इन सबका अंत हो जाएगा? हमें अपने लिए न्याय चाहिए. इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है."
"हम जानते हैं कि जिससे आप सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं उसे खोने का दर्द क्या होता है. हम सिर्फ़ इतना ही चाहते हैं कि अब कोई और न तो कौशल्या बने और न ही अमृता."
कौशल्या कहती हैं, "इस तरह की घटनाओं के पीछे एक बड़ी वजह ये भी है कि भारत में ऑनर कीलिंग के ख़िलाफ़ कोई सख़्त क़ानून नहीं है. अगर आप इसे रोकना चाहते हैं तो भारत में इसके लिए बक़ायदा एक क़ानून बनना चाहिए."
वो कहती हैं, "जो अमृता के साथ हुआ, वही मेरे साथ भी हुआ था. जिन लोगों ने मेरे शंकर को मारा, उन्हें मौत की सज़ा दी गई है. अमृता के दोषियों ने पेपर में इसके बारे में पढ़ा होगा, बावजूद इसके प्रणय मारा गया."
कौशल्या कहती हैं, "प्रणय और अमृता ने साथ-साथ ज़िंदगी गुज़ारने के सपने देखे थे. अमृता गर्भवती हैं. सोचकर देखिए, पहला बच्चा आने वाला था... कितने सारे सपने देखे होंगे दोनों ने... बच्चे के पैदा होने से लेकर उसके बड़े होने तक सपने."
"इन सबसे ज़्यादा अमृता ने प्रणय को अपनी ज़िंदगी मान लिया था और सिर्फ़ उसी पर भरोसा करके वो अपना सबकुछ छोड़कर आ गई थी. लेकिन अब वो शख़्स ही उसकी ज़िंदगी में नहीं है."
"इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एक न एक दिन अमृता इन सारी परिस्थितियों से बाहर निकल आएगी. जाति के ख़िलाफ़ खड़ा होने के लिए बहुत हिम्मत की ज़रूरत पड़ती है."
"मुझे भरोसा है कि उसका प्यार ही उसे इन सारी बातों से उबरकर आगे बढ़ने में मदद करेगा."
चेक गणराज्य के संविधान की तर्ज़ पर के.टी. शाह और के.एम. मुंशी ने प्राइवेसी के अधिकार के लिए साल 1946 में संविधान सभा में मसौदा पेश किया था. इस मसौदे में व्यक्ति की बजाय घर की व्यवस्था में प्राइवेसी के अधिकार पर ज़्यादा ज़ोर था.
लेकिन सामूहिक उत्तरदायित्वों पर ज़ोर देते हुए डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने मार्च, 1947 को संशोधित प्रस्ताव पेश किया. जिसमें संविधान के मूल अधिकारों के अध्याय तीन में निजता को अलग से मान्यता नहीं मिली.
नागरिक और राजनैतिक अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि पर भारत ने साल 1979 में ही हस्ताक्षर कर दिया था, जिसमें अनुच्छेद 17 के तहत प्राइवेसी के अधिकार के लिए भारत ने प्रतिबद्धता जताई थी.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने प्राइवेसी के ऐतिहासिक फ़ैसले में कहा कि "व्यक्ति की प्राइवेसी का राज्य द्वारा सम्मान, संविधान की आधारशिला है."
भारत के क़ानूनों में प्राइवेसी-कॉमन लॉ (ब्रिटिश क़ानून व्यवस्था) और अन्य क़ानूनों के तहत भी भारत में प्राइवेसी को मान्यता मिली है. जिनके अनुसारः
"मुझे प्रणय के लिए अमृता के प्यार पर पूरा भरोसा है और यही उसे ताक़त भी देगा."
वो कहती हैं, "अमृता जाति के ख़िलाफ़ लड़ेंगी और अपने प्यार यानी प्रणय के लिए इंसाफ़ लेंगी. उनकी इस कोशिश में हम सभी अमृता के साथ खड़े हैं."
"मैं अमृता से सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगी कि वो पेरियार और आंबेडकर के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ें. इससे उसे हिम्मत और ताक़त मिलेगी."
अपने एक इंटरव्यू में अमृता ने कहा है कि उनके माता-पिता ने प्रणय को जान से इसलिए भी मार डाला क्योंकि वो प्रेग्नेंट थीं.
"अमृता की इस बात से पूरी तरह साफ़ हो जाता है कि उनके घरवालों में जाति को लेकर किस क़दर नफ़रत भरी हुई है. उनके घरवालों को लगता है कि अगर बच्चा पैदा हो जाएगा तो उनकी जाति का सम्मान कम हो जाएगा. यही कारण है कि उन्होंने इतनी बेरहमी से प्रणय को मार डाला."
अमृता ने कहा कि वे (घरवाले) हमें दर्द देना चाहते हैं क्योंकि हमनें उनकी बात नहीं सुनी.
हमारे सामाजिक ढांचें में उनकी जाति एक-दूसरे से आंतरिक तौर पर जुड़ी हुई है.
कौशल्या कहती हैं, "सवाल ये है कि क्या जब मैं या अमृता सड़क पर उतर जाएंगे, प्रदर्शन करेंगे तो इन सबका अंत हो जाएगा? हमें अपने लिए न्याय चाहिए. इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है."
"हम जानते हैं कि जिससे आप सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं उसे खोने का दर्द क्या होता है. हम सिर्फ़ इतना ही चाहते हैं कि अब कोई और न तो कौशल्या बने और न ही अमृता."
कौशल्या कहती हैं, "इस तरह की घटनाओं के पीछे एक बड़ी वजह ये भी है कि भारत में ऑनर कीलिंग के ख़िलाफ़ कोई सख़्त क़ानून नहीं है. अगर आप इसे रोकना चाहते हैं तो भारत में इसके लिए बक़ायदा एक क़ानून बनना चाहिए."
वो कहती हैं, "जो अमृता के साथ हुआ, वही मेरे साथ भी हुआ था. जिन लोगों ने मेरे शंकर को मारा, उन्हें मौत की सज़ा दी गई है. अमृता के दोषियों ने पेपर में इसके बारे में पढ़ा होगा, बावजूद इसके प्रणय मारा गया."
कौशल्या कहती हैं, "प्रणय और अमृता ने साथ-साथ ज़िंदगी गुज़ारने के सपने देखे थे. अमृता गर्भवती हैं. सोचकर देखिए, पहला बच्चा आने वाला था... कितने सारे सपने देखे होंगे दोनों ने... बच्चे के पैदा होने से लेकर उसके बड़े होने तक सपने."
"इन सबसे ज़्यादा अमृता ने प्रणय को अपनी ज़िंदगी मान लिया था और सिर्फ़ उसी पर भरोसा करके वो अपना सबकुछ छोड़कर आ गई थी. लेकिन अब वो शख़्स ही उसकी ज़िंदगी में नहीं है."
"इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एक न एक दिन अमृता इन सारी परिस्थितियों से बाहर निकल आएगी. जाति के ख़िलाफ़ खड़ा होने के लिए बहुत हिम्मत की ज़रूरत पड़ती है."
"मुझे भरोसा है कि उसका प्यार ही उसे इन सारी बातों से उबरकर आगे बढ़ने में मदद करेगा."
आधार की अनिवार्यता को हाईकोर्ट के
पूर्व जज ने साल 2012 में चुनौती दी थी. नौ जजों की बेंच ने पांच साल बाद
2017 में प्राइवेसी पर ऐतिहासिक फ़ैसला दिया लेकिन आधार पर फ़ैसला आना अभी
बाकी है.
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
देश का क़ानून माना जाता है लेकिन प्राइवेसी पर नए क़ानून बनाने की बात हो
रही है. आधार की अनिवार्यता और वैधता के मामले में पांच जजों की बेंच ने 38
दिनों तक सुनवाई की. अब फ़ैसले का इंतज़ार पूरे देश को है.चेक गणराज्य के संविधान की तर्ज़ पर के.टी. शाह और के.एम. मुंशी ने प्राइवेसी के अधिकार के लिए साल 1946 में संविधान सभा में मसौदा पेश किया था. इस मसौदे में व्यक्ति की बजाय घर की व्यवस्था में प्राइवेसी के अधिकार पर ज़्यादा ज़ोर था.
लेकिन सामूहिक उत्तरदायित्वों पर ज़ोर देते हुए डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने मार्च, 1947 को संशोधित प्रस्ताव पेश किया. जिसमें संविधान के मूल अधिकारों के अध्याय तीन में निजता को अलग से मान्यता नहीं मिली.
नागरिक और राजनैतिक अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि पर भारत ने साल 1979 में ही हस्ताक्षर कर दिया था, जिसमें अनुच्छेद 17 के तहत प्राइवेसी के अधिकार के लिए भारत ने प्रतिबद्धता जताई थी.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने प्राइवेसी के ऐतिहासिक फ़ैसले में कहा कि "व्यक्ति की प्राइवेसी का राज्य द्वारा सम्मान, संविधान की आधारशिला है."
भारत के क़ानूनों में प्राइवेसी-कॉमन लॉ (ब्रिटिश क़ानून व्यवस्था) और अन्य क़ानूनों के तहत भी भारत में प्राइवेसी को मान्यता मिली है. जिनके अनुसारः
- आरटीआई क़ानून के तहत निजी जानकारी तीसरे व्यक्ति को नहीं दी जा सकती है.
- लोगों के टेलीफ़ोन टेप करने के लिए जाँच एजेंसियों को हर मामले में सर्वोच्च स्तर पर अनुमति लेनी पड़ती है.
- संदिग्ध अपराधियों के डीएनए टेस्ट या ब्रेन मैपिंग के लिए अदालत की अनुमति लेनी पड़ती है.
- लोगों के घरों या दफ्तरों में छापा मारने के लिए पुलिस को उच्चाधिकारियों या अदालत से अनुमति लेनी पड़ती है.
- आईपीसी क़ानून के तहत लोगों के निजी जीवन में तांक-झांक करना क़ानूनी अपराध है.
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